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Thursday, February 23, 2012

आधुनिक काल के दोहे...

विशेष नोट : ये दोहे फेसबुक पर मिले, लेकिन वहां स्पष्ट नहीं था कि यह मेरे पसंदीदा हास्य कवियों में से एक हुल्लड़ मुरादाबादी के लिखे हुए हैं अथवा नहीं... हालांकि दोहों से साफ लगता है कि ये उन्हीं की रचनाएं हैं... बहरहाल, आप लोग भी आनन्द लें...

कर्ज़ा देता मित्र को, वह मूर्ख कहलाए,
महामूर्ख वह यार है, जो पैसे लौटाए...

बिना जुर्म के पिटेगा, समझाया था तोय,
पंगा लेकर पुलिस से, साबित बचा न कोय...

गुरु पुलिस दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,
तभी पुलिस ने गुरु के, पांव दिए तुड़वाय...

पूर्ण सफलता के लिए, दो चीज़ें रखो याद,
मंत्री की चमचागिरी, पुलिस का आशीर्वाद...

नेता को कहता गधा, शरम न तुझको आए,
कहीं गधा इस बात का, बुरा मान न जाए...

बूढ़ा बोला, वीर रस, मुझसे पढ़ा न जाए,
कहीं दांत का सैट ही, नीचे न गिर जाए...

हुल्लड़ खैनी खाइए, इससे खांसी होय,
फिर उस घर में रात को, चोर घुसे न कोय...

हुल्लड़ काले रंग पर, रंग चढ़े न कोय,
लक्स लगाकर कांबली, तेंदुलकर न होय...

बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोय,
किसी भी हालत में तेरा, बाल न बांका होय...

दोहों को स्वीकारिये, या दीजे ठुकराय,
जैसे मुझसे बन पड़े, मैंने दिए बनाय...

Friday, September 23, 2011

भयन्कर पीजे (PJ) शायरी...

न जीने की तमन्ना, न मरने का खौफ,
द नम्बर यू हैव डायल्ड इज़ करेन्टली स्विच्ड ऑफ...

चेहरे पर है स्माइल, आंखों में टियर,
ऑब्जेक्ट्स इन मिरर आर क्लोज़र दैन दे अपीयर...

नाच मेरी बुलबुल, तुझे पैसा मिलेगा,
हम सीआईडी से हैं, कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा...

Wednesday, August 10, 2011

कौन क्या-क्या खाता है...? (काका हाथरसी)

विशेष नोट : काका हाथरसी बहुत छोटी-सी आयु (मेरी ही आयु की बात कर रहा हूं) से मेरे पसंदीदा हास्य कवि रहे हैं... आकाशवाणी के कार्यक्रमों को सुनने वाले जानते हैं कि उनकी कुण्डलियां बेहद प्रसिद्ध रही हैं... इन्हीं पर आधारित उनकी लिखी एक कविता आप सबके लिए kavitakosh.org से लेकर आया हूं...

खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल,
रोगी खाते औषधि, लड्डू खाएं किलोल,
लड्डू खाएं किलोल, जपें खाने की माला,
ऊंची रिश्वत खाते, ऊंचे अफसर आला,
दादा टाइप छात्र, मास्टरों का सिर खाते,
लेखक की रायल्टी, चतुर पब्लिशर खाते...

दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर,
हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर,
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएं भ्रष्टाजी,
बैंक-बौहरे-वणिक, ब्याज खाने में राजी,
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं,
न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं...

सास खा रही बहू को, घास खा रही गाय,
चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय,
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएं,
पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएं,
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते,
छेड़छाड़ में नकली मजनूं, चप्पल खाते...

सूरदास जी मार्ग में, ठोकर-टक्कर खायं,
राजीव जी के सामने, मंत्री चक्कर खायं,
मंत्री चक्कर खायं, टिकिट तिकड़म से लाएं,
एलेक्शन में हार जायं तो मुंह की खाएं,
जीजाजी खाते देखे साली की गाली,
पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली...

मंदिर जाकर भक्तगण, खाते प्रभू प्रसाद,
चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद,
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन,
कंट्रैक्टर से इंजीनियर जी खायं कमीशन,
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते,
बच्चों की फटकारें, बूढ़े होकर खाते...

दद्दा खाएं दहेज में, दो नंबर के नोट,
पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होंट,
पंडित चाटें होंट, वोट खाते हैं नेता,
खायं मुनाफा उच्च, निच्च राशन विक्रेता,
काकी मैके गई, रेल में खाकर धक्का,
कक्का स्वयं बनाकर खाते कच्चा-पक्का...

चालीसवां राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव (अशोक चक्रधर)

विशेष नोट : मेरे पसंदीदा हास्य कवियों की सूची में एक नाम बेहद अच्छे व्यंग्यकार अशोक चक्रधर का भी है... मज़ेदार बात यह है कि मेरी मां को भी उनकी रचनाएं, और उनसे भी ज़्यादा कवितापाठ करते वक्त उनके चेहरे पर आने वाली मुस्कुराहट पसंद है... वह मेरी पत्नी के अध्यापक भी रहे हैं... उनकी कई रचनाएं कभी दूरदर्शन पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में सुनी हैं... आज उन्हीं की एक और रचना आप सबके लिए लेकर आया हूं...

पिछले दिनों
चालीसवां राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव मनाया गया...
सभी सरकारी संस्थानों को बुलाया गया...

भेजी गई सभी को निमंत्रण-पत्रावली,
साथ में प्रतियोगिता की नियमावली...
लिखा था -
प्रिय भ्रष्टोदय,
आप तो जानते हैं,
भ्रष्टाचार हमारे देश की
पावन-पवित्र सांस्कृतिक विरासत है,
हमारी जीवन-पद्धति है,
हमारी मजबूरी है, हमारी आदत है...
आप अपने विभागीय भ्रष्टाचार का
सर्वोत्कृष्ट नमूना दिखाइए,
और उपाधियां तथा पदक-पुरस्कार पाइए...
व्यक्तिगत उपाधियां हैं -
भ्रष्टशिरोमणि, भ्रष्टविभूषण,
भ्रष्टभूषण और भ्रष्टरत्न,
और यदि सफल हुए आपके विभागीय प्रयत्न,
तो कोई भी पदक, जैसे -
स्वर्ण गिद्ध, रजत बगुला,
या कांस्य कउआ दिया जाएगा...
सांत्वना पुरस्कार में,
प्रमाण-पत्र और
भ्रष्टाचार प्रतीक पेय व्हिस्की का
एक-एक पउवा दिया जाएगा...
प्रविष्टियां भरिए...
और न्यूनतम योग्यताएं पूरी करते हों तो
प्रदर्शन अथवा प्रतियोगिता खंड में स्थान चुनिए...

कुछ तुले, कुछ अनतुले भ्रष्टाचारी,
कुछ कुख्यात निलंबित अधिकारी,
जूरी के सदस्य बनाए गए,
मोटी रकम देकर बुलाए गए...
मुर्ग तंदूरी, शराब अंगूरी,
और विलास की सारी चीज़ें जरूरी,
जुटाई गईं,
और निर्णायक मंडल,
यानि कि जूरी को दिलाई गईं...

एक हाथ से मुर्गे की टांग चबाते हुए,
और दूसरे से चाबी का छल्ला घुमाते हुए,
जूरी का एक सदस्य बोला -
मिस्टर भोला,
यू नो,
हम ऐसे करेंगे या वैसे करेंगे,
बट बाइ द वे,
भ्रष्टाचार नापने का पैमाना क्या है,
हम फैसला कैसे करेंगे...?

मिस्टर भोला ने सिर हिलाया,
और हाथों को घूरते हुए फरमाया -
चाबी के छल्ले को टेंट में रखिए,
और मुर्गे की टांग को प्लेट में रखिए,
फिर सुनिए मिस्टर मुरारका,
भ्रष्टाचार होता है चार प्रकार का...
पहला - नज़राना...
यानि नज़र करना, लुभाना...
यह काम होने से पहले दिया जाने वाला ऑफर है...
और पूरी तरह से
देनेवाले की श्रद्धा और इच्छा पर निर्भर है...
दूसरा - शुकराना...
इसके बारे में क्या बताना...
यह काम होने के बाद बतौर शुक्रिया दिया जाता है...
लेने वाले को
आकस्मिक प्राप्ति के कारण बड़ा मजा आता है...
तीसरा - हकराना, यानि हक जताना...
हक बनता है जनाब,
बंधा-बंधाया हिसाब...
आपसी सैटलमेंट,
कहीं दस परसेंट, कहीं पंद्रह परसेंट, कहीं बीस परसेंट...
पेमेंट से पहले पेमेंट...
चौथा - जबराना...
यानी जबर्दस्ती पाना...
यह देने वाले की नहीं,
लेने वाले की
इच्छा, क्षमता और शक्ति पर डिपेंड करता है...
मना करने वाला मरता है...
इसमें लेने वाले के पास पूरा अधिकार है,
दुत्कार है, फुंकार है, फटकार है...
दूसरी ओर न चीत्कार, न हाहाकार,
केवल मौन स्वीकार होता है...
देने वाला अकेले में रोता है...

तो यही भ्रष्टाचार का सर्वोत्कृष्ट प्रकार है...
जो भ्रष्टाचारी इसे न कर पाए, उसे धिक्कार है...
नजराना का एक प्वाइंट,
शुकराना के दो, हकराना के तीन,
और जबराना के चार...
हम भ्रष्टाचार को अंक देंगे इस प्रकार...

रात्रि का समय...
जब बारह पर आ गई सुई,
तो प्रतियोगिता शुरू हुई...

सर्वप्रथम जंगल विभाग आया,
जंगल अधिकारी ने बताया -
इस प्रतियोगिता के
सारे फर्नीचर के लिए,
चार हजार चार सौ बीस पेड़ कटवाए जा चुके हैं...
और एक-एक डबल बैड, एक-एक सोफा-सैट,
जूरी के हर सदस्य के घर, पहले ही भिजवाए जा चुके हैं...
हमारी ओर से भ्रष्टाचार का यही नमूना है,
आप सुबह जब जंगल जाएंगे,
तो स्वयं देखेंगे,
जंगल का एक हिस्सा अब बिलकुल सूना है...

अगला प्रतियोगी पीडब्ल्यूडी का,
उसने बताया अपना तरीका -
हम लैंड-फिलिंग या अर्थ-फिलिंग करते हैं...
यानि ज़मीन के निचले हिस्सों को,
ऊंचा करने के लिए मिट्टी भरते हैं...
हर बरसात में मिट्टी बह जाती है,
और समस्या वहीं-की-वहीं रह जाती है...
जिस टीले से हम मिट्टी लाते हैं,
या कागजों पर लाया जाना दिखाते हैं,
यदि सचमुच हमने उतनी मिट्टी को डलवाया होता,
तो आपने उस टीले की जगह पृथ्वी में,
अमरीका तक का आर-पार गड्ढा पाया होता...
लेकिन टीला ज्यों-का-त्यों खड़ा है,
उतना ही ऊंचा, उतना ही बड़ा है...
मिट्टी डली भी और नहीं भी,
ऐसा नमूना नहीं देखा होगा कहीं भी...

क्यू तोड़कर अचानक,
अंदर घुस आए एक अध्यापक -
हुजूर, मुझे आने नहीं दे रहे थे,
शिक्षा का भ्रष्टाचार बताने नहीं दे रहे थे, प्रभो!

एक जूरी मेंबर बोला - चुप रहो,
चार ट्यूशन क्या कर लिए,
कि भ्रष्टाचारी समझने लगे,
प्रतियोगिता में शरीक होने का दम भरने लगे...
तुम क्वालिफाई ही नहीं करते,
बाहर जाओ -
नेक्स्ट, अगले को बुलाओ...

अब आया पुलिस का एक दरोगा बोला -
हम न हों तो भ्रष्टाचार कहां होगा...?
जिसे चाहें पकड़ लेते हैं, जिसे चाहें रगड़ देते हैं,
हथकड़ी नहीं डलवानी, दो हज़ार ला,
जूते भी नहीं खाने, दो हज़ार ला,
पकड़वाने के पैसे, छुड़वाने के पैसे,
ऐसे भी पैसे, वैसे भी पैसे,
बिना पैसे, हम हिलें कैसे...?
जमानत, तफ़्तीश, इनवेस्टीगेशन,
इनक्वायरी, तलाशी या ऐसी सिचुएशन,
अपनी तो चांदी है,
क्योंकि स्थितियां बांदी हैं,
डंके का ज़ोर है,
हम अपराध मिटाते नहीं हैं,
अपराधों की फसल की देखभाल करते हैं,
वर्दी और डंडे से कमाल करते हैं...

फिर आए क्रमश:
एक्साइज़ वाले, इन्कम टैक्स वाले,
स्लम वाले, कस्टम वाले,
डीडीए वाले,
टीए, डीए वाले,
रेल वाले, खेल वाले,
हैल्थ वाले, वैल्थ वाले,
रक्षा वाले, शिक्षा वाले,
कृषि वाले, खाद्य वाले,
ट्रांसपोर्ट वाले, एअरपोर्ट वाले,
सभी ने बताए अपने-अपने घोटाले...

प्रतियोगिता पूरी हुई,
तो जूरी के एक सदस्य ने कहा -
देखो भाई,
स्वर्ण गिद्ध तो पुलिस विभाग को जा रहा है,
रजत बगुले के लिए पीडब्ल्यूडी, डीडीए के बराबर आ रहा है...
और ऐसा लगता है हमको,
कांस्य कउआ मिलेगा एक्साइज़ या कस्टम को...

निर्णय-प्रक्रिया चल ही रही थी कि
अचानक मेज फोड़कर,
धुएं के बादल अपने चारों ओर छोड़कर,
श्वेत धवल खादी में लक-दक,
टोपीधारी गरिमा-महिमा उत्पादक,
एक विराट व्यक्तित्व प्रकट हुआ...
चारों ओर रोशनी और धुआं...
जैसे गीता में श्रीकृष्ण ने,
अपना विराट स्वरूप दिखाया,
और महत्त्व बताया था...
कुछ-कुछ वैसा ही था नज़ारा...
विराट नेताजी ने मेघ-मंद्र स्वर में उचारा -
मेरे हज़ारों मुंह, हजारों हाथ हैं...
हज़ारों पेट हैं, हज़ारों ही लात हैं...
नैनं छिन्दन्ति पुलिसा-वुलिसा,
नैनं दहति संसदा...
नाना विधानि रुपाणि,
नाना हथकंडानि च...
ये सब भ्रष्टाचारी मेरे ही स्वरूप हैं,
मैं एक हूं, लेकिन करोड़ों रूप हैं...
अहमपि नजरानम् अहमपि शुकरानम्,
अहमपि हकरानम् च जबरानम् सर्वमन्यते...
भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेट, रिश्वतखोर थानेदार,
इंजीनियर, ओवरसियर, रिश्तेदार-नातेदार,
मुझसे ही पैदा हुए, मुझमें ही समाएंगे,
पुरस्कार ये सारे मेरे हैं, मेरे ही पास आएंगे...

Thursday, October 14, 2010

यादें नेताजी की... (अज्ञात)

विशेष नोट : यह हास्य कविता मुझे एक अन्य ब्लॉग hansgulle.blogspot.com पर मिली, पसंद आई, सो, आप लोगों के लिए यहां भी प्रस्तुत कर रहा हूं... किसी पाठक को यदि इसके रचयिता के बारे में जानकारी हो तो कृपया सूचित करें...

एक महाविद्यालय में
नए विभाग के लिए,
नया भवन बनवाया गया...
उसके उद्घाटन के लिए,
महाविद्यालय के एक पुराने छात्र,
लेकिन नए नेता को बुलवाया गया...

अध्यापकों ने कार के दरवाज़े खोले,
और नेताजी उतरते ही बोले...

यहां तर गईं, कितनी ही पीढ़ियां,
अहा... वही पुरानी सीढ़ियां...
वही पुराना मैदान, वही पुराने वृक्ष,
वही पुराना कार्यालय, वही पुराने कक्ष...
वही पुरानी खिड़की, वही जाली,
अहा देखिए, वही पुराना माली...

मंडरा रहे थे, यादों के धुंधलके,
थोड़ा और आगे गए चलके...
वही पुरानी चमगादड़ों की साउंड,
वही घंटा, वही पुराना प्लेग्राउंड...
छात्रों में वही पुरानी बदहवासी,
अहा, वही पुराना चपरासी...

नमस्कार, नमस्कार...
अब आया होस्टल का द्वार...
होस्टल में वही पुराने कमरे, वही पुराना खानसामा...
वही धमाचौकड़ी, वही पुराना हंगामा...

नेताजी पर,
पुरानी स्मृतियां छा रही थीं...
तभी पाया, एक कमरे से कुछ ज़्यादा ही आवाज़ें आ रही थीं...

उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया...
लड़के ने खोला, पर घबराया...
क्योंकि अन्दर एक कन्या थी,
वल्कल-वसन-वन्या थी...

दिल रह गया दहल के,
लेकिन बोला संभल के...
आइए सर, मेरा नाम मदन है,
इनसे मिलिए, मेरी कज़न है...

नेताजी लगे मुस्कुराने,
वही पुराने बहाने...

हिन्दी की दुर्दशा... (काका हाथरसी)

विशेष नोट : काका हाथरसी बहुत छोटी-सी आयु (मेरी ही आयु की बात कर रहा हूं) से ही मेरे पसंदीदा हास्य कवि रहे हैं... आकाशवाणी के कार्यक्रमों को सुनने वाले जानते हैं कि उनकी कुण्डलियां बेहद प्रसिद्ध रही हैं... ऐसी ही दो कुण्डलियां उन्होंने देश में हिन्दी की हो रही दुर्दशा पर भी लिखी थीं, जो आज kavitakosh.org से आपके सामने लेकर आ रहा हूं...

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य,
सुना, रूस में हो गई, है हिन्दी अनिवार्य,
है हिन्दी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा,
बनने वालों के मुंह पर, क्या पड़ा तमाचा,
कहं 'काका', जो ऐश कर रहे रजधानी में,
नहीं डूब सकते क्या, चुल्लू भर पानी में...

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस,
हिन्दी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस,
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी,
इंग्लिश रानी हुई हिन्द में, हिन्दी बांदी,
कहं 'काका' कविराय, ध्येय को भेजो लानत,
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत...

Wednesday, April 07, 2010

मैं बल्ब और तू ट्यूब, सखी... (बालकृष्ण गर्ग)

विशेष नोट : इंटरनेट पर एक बेहद पसंदीदा कविता ढूंढने की कोशिश में श्री बालकृष्ण गर्ग द्वारा रचित यह कविता मिल गई... कुछ साथियों की फरमाइश थी एक हास्य कविता की, सो, लीजिए, पढिए...

मैं पीला-पीला-सा प्रकाश, तू भकाभक्क दिन-सा उजास...
मैं आम पीलिया का मरीज़, तू गोरी-चिट्टी मेम खास...
मैं खर-पतवार अवांछित-सा, तू पूजा की है दूब सखी, मैं बल्ब और तू ट्यूब, सखी...

तेरी-मेरी न समता कुछ, तेरे आगे न जमता कुछ...
मैं तो साधारण-सा लट्टू, मुझमें ज़्यादा न क्षमता कुछ...
तेरी तो दीवानी दुनिया, मुझसे सब जाते ऊब सखी, मैं बल्ब और तू ट्यूब, सखी...

कम वोल्टेज में तू न जले, तब ही मेरी कुछ दाल गले...
वरना मेरी है पूछ कहां, हर जगह तुझे ही मान मिले...
हूं साइज़ में भी मैं हेठा, तेरी हाइट क्या खूब सखी, मैं बल्ब और तू ट्यूब, सखी...

बिजली का तेरा खर्चा कम, लेकिन लाइट में कितना दम...
सोणिये, इलेक्शन बिना लड़े ही, जीत जाए तू खुदा कसम...
नैया मेरी मंझधार पड़ी, लगता जाएगी डूब सखी, मैं बल्ब और तू ट्यूब, सखी...

तू महंगी है, मैं सस्ता हूं, तू चांदी तो मैं जस्ता हूं...
इठलाती है तू अपने पर, लेकिन मैं खुद पर हंसता हूं...
मैं कभी नहीं बन पाऊंगा, तेरे दिल का महबूब सखी, मैं बल्ब और तू ट्यूब, सखी...

Saturday, December 19, 2009

चल गई... (शैल चतुर्वेदी)

विशेष नोट : एक और भी हास्य कवि थे, स्वर्गीय शैल चतुर्वेदी, जिनकी यह कविता बचपन में दूरदर्शन पर आते रहने वाले हास्य कवि सम्मेलनों में कई बार सुनी... आज एक वेबसाइट पर दिखी तो आप लोगों के लिए भी अपने ब्लॉग पर ले आया हूं...

वैसे तो एक शरीफ इंसान हूं...
आप ही की तरह श्रीमान हूं...
मगर अपनी आंख से बहुत परेशान हूं...
अपने आप चलती है...
लोग समझते हैं, चलाई गई है...
जान-बूझकर मिलाई गई है...

एक बार बचपन में...
शायद सन पचपन में...
क्लास में...
एक लड़की बैठी थी पास में...
नाम था सुरेखा...
उसने हमें देखा...
और बांई चल गई...
लड़की हाय-हाय...
क्लास छोड़ बाहर निकल गई...

थोड़ी देर बाद...
हमें है याद...
प्रिंसिपल ने बुलाया...
लंबा-चौड़ा लेक्चर पिलाया...
हमने कहा, जी, भूल हो गई...
वो बोले, ऐसा भी होता है भूल में...
शर्म नहीं आती,
ऐसी गंदी हरकतें करते हो,
स्कूल में...
और इससे पहले कि,
हकीकत बयान करते...
कि फिर चल गई...
प्रिंसिपल को खल गई...
हुआ यह परिणाम...
कट गया नाम...

बमुश्किल तमाम...
मिला एक काम...
इंटरव्यू में, खड़े थे क्यू में...
एक लड़की थी सामने अड़ी...
अचानक मुड़ी...
नजर उसकी हम पर पड़ी...
और आंख चल गई...
लड़की उछल गई...
दूसरे उम्मीदवार चौंके...
उस लडकी की साइड लेकर...
हम पर भौंके...

फिर क्या था...
मार-मार जूते-चप्पल...
फोड़ दिया बक्कल...
सिर पर पांव रखकर भागे...
लोग-बाग पीछे, हम आगे...
घबराहट में घुस गए एक घर में...
भयंकर पीड़ा थी सिर में...
बुरी तरह हांफ रहे थे...
मारे डर के कांप रहे थे...
तभी पूछा उस गृहिणी ने...
कौन...?
हम खड़े रहे मौन...
वो बोली,
बताते हो या किसी को बुलाऊं...?
और उससे पहले...
कि जबान हिलाऊं...
चल गई...

वह मारे गुस्से के...
जल गई...
साक्षात दुर्गा-सी दीखी...
बुरी तरह चीखी...
बात की बात में...
जुड़ गए अड़ोसी-पड़ोसी...
मौसा-मौसी...
भतीजे-मामा...
मच गया हंगामा...
चड्डी बना दिया हमारा पजामा...
बनियान बन गया कुर्ता...
मार-मार बना दिया भुरता...

हम चीखते रहे...
और पीटने वाले...
हमें पीटते रहे...
भगवान जाने कब तक...
निकालते रहे रोष...
और जब हमें आया होश...
तो देखा, अस्पताल में पड़े थे...
डाक्टर और नर्स घेरे खड़े थे...

हमने अपनी एक आंख खोली...
तो एक नर्स बोली...
दर्द कहां है...?
हम कहां-कहां बताते...
और इससे पहले कि कुछ कह पाते...
चल गई...

नर्स कुछ नहीं बोली...
बाई गॉड... (चल गई)
मगर डाक्टर को खल गई...
बोला, इतने सीरियस हो...
फिर भी ऐसी हरकत,
कर लेते हो इस हाल में...
शर्म नहीं आती मोहब्बत करते हुए,
अस्पताल में...?

उन सबके जाते ही आया वार्ड-बॉय...
देने लगा अपनी राय...
भाग जाएं चुपचाप...
नहीं जानते आप...
बढ़ गई है बात...
डाक्टर को गड़ गई है...
केस आपका बिगड़वा देगा...
न हुआ तो मरा बताकर...
जिंदा ही गड़वा देगा...

तब अंधेरे में आंखें मूंदकर...
खिड़की से कूदकर भाग आए...
जान बची तो लाखों पाए...

एक दिन सकारे...
बाप जी हमारे...
बोले हमसे,
अब क्या कहें तुमसे...?
कुछ नहीं कर सकते,
तो शादी कर लो...
लड़की देख लो...
मैंने देख ली है,
जरा हैल्थ की कच्ची है...
बच्ची है, फिर भी अच्छी है...
जैसी भी, आखिर लड़की है...
बड़े घर की है...
फिर बेटा,
यहां भी तो कड़की है...

हमने कहा,
जी, अभी क्या जल्दी है...?
वह बोले,
गधे हो...
ढाई मन के हो गए,
मगर बाप के सीने पर लदे हो...
वह घर फंस गया तो संभल जाओगे...

तब एक दिन भगवान से मिलके...
धड़कता दिल ले...
पहुंच गए रुड़की,
देखने लड़की...
शायद हमारी होने वाली सास...
बैठी थी हमारे पास...
बोली, यात्रा में तकलीफ तो नहीं हुई...
और आंख मुई चल गई...

वह समझी कि मचल गई...
बोली, लड़की तो अंदर है...
मैं लड़की की मां हूं...
लड़की को बुलाऊं...
और इससे पहले कि मैं जुबान हिलाऊं...
आंख चल गई दुबारा...
उन्होंने किसी का नाम ले पुकारा...
झटके से खड़ी हो गईं...

हम जैसे गए थे, लौट आए...
घर पहुंचे मुंह लटकाए...
पिता जी बोले,
अब क्या फायदा,
मुंह लटकाने से...
आग लगे ऐसी जवानी में,
डूब मरो चुल्लू भर पानी में...
नहीं डूब सकते तो आंखें फोड़ लो...
नहीं फोड़ सकते हमसे नाता ही तोड़ लो...
जब भी कहीं जाते हो,
पिटकर ही आते हो...
भगवान जाने कैसे चलाते हो...?

अब आप ही बताइए,
क्या करूं...?
कहां जाऊं...?
कहां तक गुन गाऊं,
अपनी इस आंख के...
कमबख्त जूते खिलवाएगी,
लाख-दो-लाख के...
अब आप ही संभालिए...
मेरा मतलब है कि कोई रास्ता निकालिए...
जवान हो या वृद्धा,
पूरी हो या अद्धा...
केवल एक लड़की...
जिसकी एक आंख चलती हो...
पता लगाइए...
और मिल जाए तो,
हमारे आदरणीय 'काका' जी को बताइए...

पोल-खोलक यंत्र... (अशोक चक्रधर)

विशेष नोट : मेरे पसंदीदा हास्य कवियों की सूची में एक नाम बेहद अच्छे व्यंग्यकार अशोक चक्रधर का भी है... मज़ेदार बात यह है कि मेरी मां को भी उनकी रचनाएं, और उनसे भी ज़्यादा कवितापाठ करते वक्त उनके चेहरे पर आने वाली मुस्कुराहट पसंद है... वह मेरी पत्नी के अध्यापक भी रहे हैं... उनकी कई रचनाएं कभी दूरदर्शन पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में सुनी हैं... आज उन्हीं
की एक रचना आप सबके लिए भी...


ठोकर खाकर हमने,
जैसे ही यंत्र को उठाया,
मस्तक में शूं-शूं की ध्वनि हुई,
कुछ घरघराया...

झटके से गरदन घुमाई,
पत्नी को देखा,
अब यंत्र से,
पत्नी की आवाज़ आई...
मैं तो भर पाई...!
सड़क पर चलने तक का,
तरीक़ा नहीं आता,
कोई भी मैनर,
या सली़क़ा नहीं आता...
बीवी साथ है,
यह तक भूल जाते हैं...
और भिखमंगे-नदीदों की तरह,
चीज़ें उठाते हैं...
...इनसे,
इनसे तो,
वो पूना वाला,
इंजीनियर ही ठीक था...
जीप में बिठा के मुझे शॉपिंग कराता,
इस तरह राह चलते,
ठोकर तो न खाता...

हमने सोचा,
यंत्र ख़तरनाक है...!
और यह भी इत्तफ़ाक़ है,
कि हमको मिला है,
और मिलते ही,
पूना वाला गुल खिला है...

और भी देखते हैं,
क्या-क्या गुल खिलते हैं...?
अब ज़रा यार-दोस्तों से मिलते हैं...

तो हमने एक दोस्त का,
दरवाज़ा खटखटाया...
द्वार खोला, निकला, मुस्कुराया...
दिमाग़ में होने लगी आहट,
कुछ शूं-शूं,
कुछ घरघराहट...
यंत्र से आवाज़ आई,
अकेला ही आया है,
अपनी छप्पनछुरी,
गुलबदन को,
नहीं लाया है...

प्रकट में बोला,
ओहो...!
कमीज़ तो बड़ी फ़ैन्सी है...!
और सब ठीक है...?
मतलब, भाभीजी कैसी हैं...?
हमने कहा,
भा... भी... जी...
या छप्पनछुरी गुलबदन...?

वो बोला,
होश की दवा करो श्रीमन्‌,
क्या अण्ट-शण्ट बकते हो...
भाभीजी के लिए,
कैसे-कैसे शब्दों का,
प्रयोग करते हो...?

हमने सोचा,
कैसा नट रहा है,
अपनी सोची हुई बातों से ही,
हट रहा है...
सो, फ़ैसला किया,
अब से बस सुन लिया करेंगे,
कोई भी अच्छी या बुरी,
प्रतिक्रिया नहीं करेंगे...

लेकिन अनुभव हुए नए-नए,
एक आदर्शवादी दोस्त के घर गए...
स्वयं नहीं निकले...
वे आईं,
हाथ जोड़कर मुस्कुराईं,
मस्तक में भयंकर पीड़ा थी,
अभी-अभी सोए हैं...
यंत्र ने बताया,
बिल्कुल नहीं सोए हैं,
न कहीं पीड़ा हो रही है,
कुछ अनन्य मित्रों के साथ,
द्यूत-क्रीड़ा हो रही है...

अगले दिन कॉलिज में,
बीए फ़ाइनल की क्लास में,
एक लड़की बैठी थी,
खिड़की के पास में...
लग रहा था,
हमारा लेक्चर नहीं सुन रही है,
अपने मन में,
कुछ और-ही-और,
गुन रही है...
तो यंत्र को ऑन कर,
हमने जो देखा,
खिंच गई हृदय पर,
हर्ष की रेखा...
यंत्र से आवाज़ आई,
सर जी यों तो बहुत अच्छे हैं,
लंबे और होते तो,
कितने स्मार्ट होते...!

एक सहपाठी,
जो कॉपी पर उसका,
चित्र बना रहा था,
मन-ही-मन उसके साथ,
पिकनिक मना रहा था...
हमने सोचा,
फ़्रायड ने सारी बातें,
ठीक ही कही हैं,
कि इंसान की खोपड़ी में,
सेक्स के अलावा कुछ नहीं है...

कुछ बातें तो,
इतनी घिनौनी हैं,
जिन्हें बतलाने में,
भाषाएं बौनी हैं...

एक बार होटल में,
बेयरा पांच रुपये बीस पैसे,
वापस लाया,
पांच का नोट हमने उठाया,
बीस पैसे टिप में डाले,
यंत्र से आवाज़ आई,
चले आते हैं,
मनहूस, कंजर कहीं के, साले,
टिप में पूरे आठ आने भी नहीं डाले...
हमने सोचा,
ग़नीमत है,
कुछ महाविशेषण और नहीं निकाले...

ख़ैर साहब...!,
इस यंत्र ने बड़े-बड़े गुल खिलाए हैं...
कभी ज़हर तो कभी,
अमृत के घूंट पिलाए हैं...
वह जो लिपस्टिक और पाउडर में,
पुती हुई लड़की है,
हमें मालूम है,
उसके घर में कितनी कड़की है...!
और वह जो पनवाड़ी है,
यंत्र ने बता दिया,
कि हमारे पान में,
उसकी बीवी की झूठी सुपारी है...

एक दिन कवि सम्मेलन मंच पर भी,
अपना यंत्र लाए थे,
हमें सब पता था,
कौन-कौन कवि,
क्या-क्या करके आए थे...

ऊपर से वाह-वाह,
दिल में कराह,
अगला हूट हो जाए, पूरी चाह...
दिमाग़ों में आलोचनाओं का इज़ाफ़ा था,
कुछ के सिरों में सिर्फ,
संयोजक का लिफ़ाफ़ा था...

ख़ैर साहब,
इस यंत्र से हर तरह का भ्रम गया,
और मेरे काव्य-पाठ के दौरान,
कई कवि मित्र,
एक साथ सोच रहे थे,
अरे, यह तो जम गया...!

Friday, December 18, 2009

मुश्किल है अपना मेल प्रिये… (अज्ञात)

विशेष नोट : इस कविता के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है, और न ही यह मेरे बचपन की यादों में से निकली है... यह मुझे किसी मित्र ने ईमेल के जरिये भेजी थी, और मुझे इतनी पसंद आई कि यहां पहुंच गई, ताकि आप लोग भी इसका आनंद ले सकें...

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

तुम एमए फर्स्ट डिवीज़न हो, मैं हुआ था मैट्रिक फेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

तुम फौजी अफसर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूं,
तुम रबड़ी-खीर-मलाई हो, मैं तो सत्तू सपरेटा हूं...
तुम एसी घर में रहती हो, मैं पेड़ के नीचे लेटा हूं,
तुम नई मारुति लगती हो, मैं स्कूटर लम्बरेटा हूं...
इस कदर अगर हम छिप-छिपकर आपस में प्रेम बढ़ाएंगे,
तो एक रोज़ तेरे डैडी अमरीश पुरी बन जाएंगे...
सब हड्डी-पसली तोड़ मुझे वह भिजवा देंगे जेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

तुम अरब देश की घोड़ी हो, मैं हूं गदहे की चाल प्रिये,
तुम दीवाली का बोनस हो, मैं भूखों की हड़ताल प्रिये...
तुम हीरे-जड़ी तश्तरी हो, मैं एल्मुनियम का थाल प्रिये,
तुम चिकन-सूप-बिरयानी हो, मैं कंकड़ वाली दाल प्रिये...
तुम हिरन चौकड़ी भरती हो, मैं हूं कछुए की चाल प्रिये,
तुम चंदन वन की लकड़ी हो, मैं हूं बबूल की छाल प्रिये...
मैं पके आम-सा लटका हूं, मत मारो मुझे गुलेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

मैं शनिदेव जैसा कुरूप, तुम कोमल कंचन काया हो,
मैं तन से मन से कांशी हूं, तुम महाचंचला माया हो...
तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूं,
तुम राजघाट का शांतिमार्च, मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगा हूं...
तुम हो पूनम का ताजमहल, मैं काली गुफा अजंता की,
तुम हो वरदान विधाता का, मैं गलती हूं भगवंता की...
तुम जेट विमान की शोभा हो, मैं बस की ठेलम-ठेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

तुम नई विदेशी मिक्सी हो, मैं पत्थर का सिलबट्टा हूं,
तुम एके-सैंतालिस जैसी, मैं तो एक देसी कट्टा हूं...
तुम चतुर राबड़ी देवी सी, मैं भोला-भाला लालू हूं,
तुम मुक्त शेरनी जंगल की, मैं चिड़ियाघर का भालू हूं...
तुम व्यस्त सोनिया गांधी सी, मैं वीपी सिंह सा खाली हूं,
तुम हंसी माधुरी दीक्षित की, मैं पुलिसमैन की गाली हूं...
गर जेल मुझे हो जाए तो, दिलवा देना तुम बेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

मैं ढाबे के ढांचे जैसा, तुम पांच-सितारा होटल हो,
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम रेड लेबल की बोतल हो...
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कृषि दर्शन की झाड़ी हूं,
तुम विश्व सुन्दरी सी महान, मैं तेली छाप कबाड़ी हूं...
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला चोंगा,
तुम मछली मानसरोवर की, मैं सागर तट का हूं घोंघा...
दस मंजिल से गिर जाऊंगा, मत आगे मुझे धकेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

तुम जयाप्रदा की साड़ी हो, मैं शेखर वाली दाढ़ी हूं,
तुम सुषमा जैसी विदुषी हो, मैं लल्‍लूलाल अनाड़ी हूं...
तुम जया जेटली-सी कोमल, मैं सिंह मुलायम-सा कठोर,
तुम हेमा मालिनी-सी सुंदर, मैं बंगारू की तरह बोर...
तुम सत्‍ता की महारानी हो, मैं विपक्ष की लाचारी हूं,
तुम हो ममता-जयललिता-सी, मैं क्‍वारा अटल बिहारी हूं...
तुम संसद की सुंदरता हो, मैं हूं तिहाड़ की जेल प्रिये,
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये...

इतिहास की परीक्षा... (अज्ञात)

विशेष नोट : यह मेरे बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक है... इसे और परीक्षा से ही जुड़ी एक अन्य कविता को मैंने सिर्फ एक-एक बार सुनकर याद किया था, और आज भी बिना रुके टाइप करता चला गया...

इतिहास परीक्षा थी उस दिन,
चिंता से हृदय धड़कता था,
जब से जागा था सुबह, तभी से,
बायां नयन फड़कता था...

जो उत्तर मैंने याद किए,
उनमें से आधे याद हुए,
वे भी स्कूल पहुंचने तक,
यादों में ही बरबाद हुए...

जो सीट दिखाई दी खाली,
उस पर ही डटकर जा बैठा,
था एक निरीक्षक कमरे में,
वह आया, झल्लाया, ऐंठा...

रे, रे, तेरा है ध्यान किधर,
क्यों करके आया देरी है,
तू यहां कहां पर आ बैठा,
उठ जा, यह कुर्सी मेरी है...

मैं उचका एक उचक्के-सा,
मुझमें सीटों में मैच हुआ,
चकरा-टकराकर कहीं एक,
कुर्सी के द्बारा कैच हुआ...

पर्चे पर मेरी नज़र पड़ी,
तो सारा बदन पसीना था,
फिर भी पर्चे से डरा नहीं जो,
यह मेरा ही सीना था...

कॉपी के बरगद पर मैंने,
बस, कलम-कुल्हाड़ा दे मारा,
घंटे-भर के भीतर कर डाला,
प्रश्नों का वारा-न्यारा...

गौतम जो बुद्ध हुए जाकर,
वह गांधी जी के चेले थे,
दोनों बचपन में नेहरू के संग,
आंख-मिचौनी खेले थे...

होटल का मालिक था अशोक,
जो ताज महल में रहता था,
ओ अंग्रेजों, भारत छोड़ो,
वह लाल किले से कहता था...

झांसा दे जाती थी सबको,
ऐसी थी झांसी की रानी,
अक्सर अशोक के होटल में,
खाया करती थी बिरयानी...

ऐसे ही चुन-चुनकर मैंने,
प्रश्नों के पापड़ बेल दिए,
उत्तर के ये ऊंचे पहाड़,
टीचर की ओर धकेल दिए...

टीचर जी इस ऊंचाई तक,
बेचारे कैसे चढ़ पाते,
लाचार पुराने चश्मे से,
इतिहास नया क्या पढ़ पाते...

उनके बस के बाहर,
मेरे इतिहासों का भूगोल हुआ,
ऐसे में फिर क्या होना था,
मेरा नम्बर गोल हुआ...

परीक्षा और प्रार्थना... (अज्ञात)

विशेष नोट : यह मेरे बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक है... इसे और परीक्षा से ही जुड़ी एक अन्य कविता को मैंने सिर्फ एक-एक बार सुनकर याद किया था, और आज भी बिना रुके टाइप करता चला गया...

हे प्रभो, इस दास की, इतनी विनय सुन लीजिए,
मार ठोकर नाव मेरी, पार कर ही दीजिए...

मैं नहीं डरता प्रलय से, मौत या तूफ़ान से,
कांपती है रूह मेरी, बस सदा इम्तिहान से...

पाठ पढ़ना, याद करना, याद करके सोचना,
सोचकर लिखना उसे, लिखकर उसे फिर घोटना...

टांय टा टा टांय टा टा, रोज़ रटता हूं प्रभो,
पुस्तकों के रात-दिन, पन्ने उलटता हूं प्रभो...

भाग्य में लेकिन न जाने, कौन-सा अभिशाप है,
रात को रटता, सुबह मैदान मिलता साफ़ है...

पी गई इंग्लिश, हमारी खोपड़ी के खून को,
मैं समझ पाया नहीं, इस बेतुके मजमून को...

अक्ल अलजेब्रा हमारी, जाएगा जड़ से पचा,
तीन में से छः गए तो और बाकी क्या बचा...

नाश हो इतिहास का, सन के समंदर बह गए,
मर गए वे लोग, रोने के लिए हम रह गए...

शाहजहां, बाबर, हुमायूं, और अकबर आप थे,
कौन थे बेटे न जाने, कौन किसके बाप थे...

भूगोल में था प्रश्न आया, गोल है कैसे धरा,
और मैंने एक क्षण में, लिख दिया उत्तर खरा...

गोल है पूरी-कचौरी, और पापड़ गोल है,
गोल रसगुल्ला, जलेबी गोल, लड्डू गोल है...

गोलगप्पा गोल है, मुंह भी हमारा गोल है,
इसीलिए हे मास्टरजी, यह धरा भी गोल है...

झूम उठे मास्टरजी, इस अनोखे ज्ञान पे,
और उन्होंने पेपर पर लिख दिया यह शान से...

ठीक है बेटा, हमारी लेखनी भी गोल है,
गोल है दवात, नम्बर भी तुम्हारा गोल है...

राम-रामौ, राम-रामौ, हाय प्यारी संस्कृतम्,
तुम न आईं, मर गया मैं, रच्छ-गच्छ कचूमरम्...

अंड-वंडम्, चंड-खंडम्, रुण्ड-मुण्ड चराचरम्,
चट्ट रोटी, पट्ट दालम्, चट्ट-पट्ट सफाचटम्...

हे भगवन, मुझे गधा बना दे... (राम अवतार रस्तोगी 'शैल')

विशेष नोट : अधिकतर बच्चों की तरह मेरे आदर्श भी मेरे पिता ही रहे हैं... सरकारी नौकरी छोड़कर मेरे पत्रकार बन जाने की एकमात्र वजह भी यही थी कि वह पत्रकार थे... अपने कॉलेज के समय में वह 'शैल' उपनाम से कविता भी किया करते थे, सो, आज उनकी डायरी से एक हास्य कविता आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं... यह कविता उनकी डायरी के मुताबिक 28 दिसम्बर, 1964 को लिखी गई थी...

बहुत सोचता हूं, मगर कैसे हो यह,
मुझे मेरा स्वामी गधा इक बना दे...
जानता हूं, हंसोगे, हंसो खूब खुलकर,
मगर मुझको भगवन, गधा अब बना दे...

है बर्दाश्त कितनी, यह सब कुछ है सहता,
कोई दे ले गाली, या फिर पीट डाले,
नहीं चूं करेगा, कभी यह बेचारा,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...

मार कब तक सहूं, अपनी बीवी की हरदम,
औ' बच्चे मेरे, मुझको आंखें दिखाते,
इसी से तमन्ना यह भारी मेरी है,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...

जो विद्वान होगा, वह गंभीर होगा,
इसे हम यहां पर सदा सत्य पाते,
गधे-सा नहीं और गंभीर होता,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...

दफ्तर में गाली सहूं बॉस की मैं,
घर में बच्चों की अपने सवारी बनूं मैं,
बीवी का प्यारा रहूं मैं हमेशा,
अगर मुझको भगवन, गधा अब बना दे...

आराम करो... (गोपालप्रसाद व्यास)

विशेष नोट : एक और हास्य कविता प्रस्तुत है, जो मुझे बहुत पसंद है...

एक मित्र मिले, बोले, लाला, तुम किस चक्की का खाते हो,
इस डेढ़ छंटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो...,
क्या रक्खा मांस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो,
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो...
हम बोले, रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो,
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो...

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है,
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है...
आराम शब्द में 'राम' छिपा, जो भव-बंधन को खोता है,
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है...
इसलिए तुम्हें समझाता हूं, मेरे अनुभव से काम करो,
यह जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो...

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो,
अपने घर में बैठे-बैठे, बस लंबी-लंबी बात करो...
करने-धरने में क्या रक्खा, जो रक्खा बात बनाने में,
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में...
तुम मुझसे पूछो, बतलाऊं, है मज़ा, मूर्ख कहलाने में,
जीवन-जागृति में क्या रक्खा, जो रक्खा है सो जाने में...

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूं,
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूं...
दीए जलने के पहले ही, घर में आ जाया करता हूं,
जो मिलता है, खा लेता हूं, चुपके सो जाया करता हूं...
मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं...

अदवायन खिंची खाट में जो, पड़ते ही आनंद आता है,
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊंचा उठ जाता है...
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सिर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूं इस सिर में, इंजन जैसा लग जाता है...
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूं, बुद्धि भी फक-फक करती है,
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है...

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूं,
मैं पड़ा खाट पर बूटों को, ऊंटों की उपमा देता हूं...
मैं खटरागी हूं, मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं,
छत की कड़ियां गिनते-गिनते, छंदों के बंध टूटते हैं...
मैं इसीलिए तो कहता हूं, मेरे अनुभव से काम करो,
यह खाट बिछा लो आंगन में, लेटो, बैठो, आराम करो...

शिव का धनुष (काका हाथरसी)

विशेष नोट : काका हाथरसी बहुत छोटी-सी आयु (मेरी ही आयु की बात कर रहा हूं) से ही मेरे पसंदीदा हास्य कवि रहे हैं... उनकी एक बढ़िया कविता प्रस्तुत है...

विद्यालय में आ गए इंस्पेक्टर स्कूल,
छठी क्लास में पढ़ रहा विद्यार्थी हरफूल,
विद्यार्थी हरफूल, प्रश्न उससे कर बैठे,
किसने तोड़ा शिव का धनुष बताओ बेटे,
छात्र सिटपिटा गया बिचारा, धीरज छोड़ा,
हाथ जोड़कर बोला, सर, मैंने ना तोड़ा...

यह उत्तर सुन आ गया, सर के सर को ताव,
फौरन बुलवाए गए हेड्डमास्टर साब,
हेड्डमास्टर साब, पढ़ाते हो क्या इनको,
किसने तोड़ा धनुष नहीं मालूम है जिनको,
हेडमास्टर भन्नाया, फिर तोड़ा किसने,
झूठ बोलता है, जरूर तोड़ा है इसने...

इंस्पेक्टर अब क्या कहे, मन ही मन मुसकात,
ऑफिस में आकर हुई, मैनेजर से बात,
मैनेजर से बात, छात्र में जितनी भी है,
उसमें दुगुनी बुद्धि हेडमास्टर जी की है,
मैनेजर बोला, जी, हम चन्दा कर लेंगे,
नया धनुष उससे भी अच्छा बनवा देंगे...

शिक्षा-मंत्री तक गए जब उनके जज़बात,
माननीय गदगद हुए, बहुत खुशी की बात,
बहुत खुशी की बात, धन्य हैं ऐसे बच्चे,
अध्यापक, मैनेजर भी हैं कितने सच्चे,
कह दो उनसे, चन्दा कुछ ज्यादा कर लेना,
जो बैलेन्स बचे वह हमको भिजवा देना...

साभार: काका की विशिष्ट रचनाएं, डायमंड पॉकेट बुक्स

नख-शिख वर्णन... (काका हाथरसी)

विशेष नोट : काका हाथरसी बहुत छोटी-सी आयु (मेरी ही आयु की बात कर रहा हूं) से ही मेरे पसंदीदा हास्य कवि रहे हैं... उनकी एक पुस्तक 'काका काकी के लव लेटर्स' वर्ष 1980 में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने अविवाहित जीवन के संस्मरणों का उल्लेख करते हुए अपनी 'होने वाली पत्नी' की सुन्दरता का बखान किया था, जिसे उन्होंने सपने में देखा था... यह मुझे आज तक याद है, और मुझे बेहद पसंद भी है...

सीस मध्य जो मांग है, लागे अति रमणीक,
काहु पार्क की घास में, जैसे लम्बी लीक...

ललि को ललित ललाट ज्यों, कलाकंद-कौ थाल,
खुरमा, खस्ता, कचौड़ी, रसगुल्ला-से गाल...

नज़र रोकने के लिए, बिंदिया दीनी भाल,
जैसे चलती रेल को, रोके सिगनल लाल...

भिन्डी जैसी भृकुटि हैं, तुरई जैसी नाक,
जामुन जैसी पुतलियां, आंख आम की फांक...

कच्चे पापड़-से पलक, ढंके-उघारें नैन,
मन में कुदकें मेंढका, मटकाओ जब सैन...

झिलमिल झुमका कान में, झूलन को मजबूर,
जैसे मगही पान में, टांक दिए अंगूर...

हंसत गाल गड्ढा परें, चित्र बनत तत्काल,
जैसे गहरी झील सों, सोभित नैनीताल...

दंत-पंक्ति मक्का जडी, लाल मिर्च-से होंठ,
जीभ लपाके लेय तौ, कहा हमारौ खोट...

ठोड़ी पर गुदना गुदयो, ऐसौ लाग्यौ मोय,
ज्यों होंठन की ओट में, भंवरा बैठो होय...

ग्रीवा बोतल सुरा की, जिय में भरती जोश,
लड़खड़ाएं गिर-गिर पड़ें, बिना पिए मदहोश...

लट लहराएं वक्ष पर, जैसे करियल सांप,
मन ललचाए छुअन को, हाथ रहे हैं कांप...

कुच, कुछ-कुछ ऐसे लगें, जैसे पंख पसार,
दो पक्षी हों वृक्ष पर, उड़ने को तैयार...

भुज भुजबंदों से सजी, अंगिया देत बहार,
लटकें लौकी लता में, जैसे छप्पर फार...

पतरी-पतरी अंगुलियां, मन को रहीं लुभाय,
ज्यों लखनऊ की ककड़ियां, रक्खी झाल सजाय...

कटि काका की छड़ी-सी, जंघा मुगदर लम्ब,
दो तरबूजे फिट किए, ऐसे सुघड़ नितम्ब...

लाल महावर सों सजी, एड़ी सेब समान,
तलुआ हलुआ-से लगें, चाटें सजन सुजान...

नवल-नुकीले नख दिए, नहिं विधना को खोट,
कोऊ छेड़खानी करे, लीजै नोंच-खसोट...

खांसे तो खम्माज है, हांसे तो हिंडोल,
मिमियाए तो मारवा, बीन सरीखे बोल...

रूप-सूप पीवत रहें, झिय में उठत उमंग,
पिय के हिय सब धंसि गए, तिय के अंग-प्रत्यंग...

कबहुं न बासी है सके, कबहुं न बूढ़ी होय,
बनी रहे चिर-यौवना, कबहुं न छोड़े मोय...

नाम-रूप का भेद... (काका हाथरसी)

विशेष नोट : काका हाथरसी बहुत छोटी-सी आयु (मेरी ही आयु की बात कर रहा हूं) से ही मेरे पसंदीदा हास्य कवि रहे हैं... उनकी एक बढ़िया कविता प्रस्तुत है...


नाम-रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर,
नाम मिला कुछ और, तो शक्ल-अक्ल कुछ और,
शक्ल-अक्ल कुछ और, नयनसुख देखे काने,
बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने,
कह 'काका' कवि, दयाराम जी मारें मच्छर,
विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर...

मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप,
श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप,
जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट-पैंट में,
ज्ञानचंद छह बार फ़ेल हो गए टैंथ में,
कह 'काका', ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे,
पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे...

देख अशर्फ़ीलाल के घर में टूटी खाट,
सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ,
मील चल रहे आठ, करम के मिटें न लेखे,
धनीराम जी हमने प्रायः निर्धन देखे,
कह 'काका' कवि, दूल्हेराम मर गए कुंवारे,
बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बेचारे...

दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल,
मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल,
रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं,
ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भौंक रहे हैं,
‘काका’ छै फिट लंबे छोटूराम बनाए,
नाम दिगंबरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए...

पेट न अपना भर सके, जीवन भर जगपाल,
बिना सूंड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल,
मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज़ सम्हारी,
बैग कुली को दिया, चले मिस्टर गिरधारी
कह 'काका' कविराय, करें लाखों का सट्टा,
नाम हवेलीराम किराये का है अट्टा...

दूर युद्ध से भागते, नाम रखा रणधीर,
भागचंद की आज तक सोई है तकदीर,
सोई है तकदीर, बहुत-से देखे-भाले,
निकले प्रिय सुखदेव सभी, दुख देने वाले,
कहं ‘काका’ कविराय, आंकड़े बिल्कुल सच्चे,
बालकराम ब्रह्मचारी के बारह बच्चे...

चतुरसेन बुद्धू मिले, बुद्धसेन निर्बुद्ध,
श्री आनंदीलाल जी रहें सर्वदा क्रुद्ध,
रहें सर्वदा क्रुद्ध, मास्टर चक्कर खाते,
इंसानों को मुंशी तोताराम पढ़ाते,
कह 'काका', बलवीर सिंह जी लटे हुए हैं,
थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुए हैं...

बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल,
सूखे गंगाराम जी, रूखे मक्खनलाल,
रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी,
निकले बेटा आशाराम निराशावादी,
कह 'काका' कवि, भीमसेन पिद्दी-से दिखते,
कविवर ‘दिनकर’ छायावादी कविता लिखते...

आकुल-व्याकुल दीखते शर्मा परमानंद,
कार्य अधूरा छोड़कर भागे पूरनचंद,
भागे पूरनचंद अमरजी मरते देखे,
मिश्रीबाबू कड़वी बातें करते देखे,
कहं ‘काका’, भंडारसिंह जी रीते-थोथे,
बीत गया जीवन विनोद का रोते-धोते...

शीला जीजी लड़ रहीं, सरला करतीं शोर,
कुसुम, कमल, पुष्पा, सुमन निकलीं बड़ी कठोर,
निकलीं बड़ी कठोर, निर्मला मन की मैली,
सुधा सहेली अमृतबाई सुनीं विषैली,
कहं ‘काका’ कवि, बाबूजी क्या देखा तुमने,
बल्ली जैसी मिस लल्ली देखी है हमने...

तेजपाल जी भोथरे, मरियल-से मलखान,
लाला दानसहाय ने करी न कौड़ी दान,
करी न कौड़ी दान, बात अचरज की भाई,
वंशीधर ने जीवन-भर वंशी न बजाई,
कह 'काका' कवि, फूलचंद जी इतने भारी,
दर्शन करते ही टूट जाए कुर्सी बेचारी...

खट्टे-खारी-खुरखुरे मृदुलाजी के बैन,
मृगनयनी के देखिए, चिलगोज़ा-से नैन,
चिलगोज़ा-से नैन, शांता करतीं दंगा,
नल पर नहातीं, गोदावरी, गोमती, गंगा,
कह काका कवि, लज्जावती दहाड़ रही हैं,
दर्शन देवी लंबा घूंघट काढ़ रही हैं...

कलियुग में कैसे निभे पति-पत्नी का साथ,
चपलादेवी को मिले बाबू भोलानाथ,
बाबू भोलानाथ, कहां तक कहें कहानी,
पंडित रामचंद्र की पत्नी राधारानी,
‘काका’, लक्ष्मीनारायण की गृहिणी रीता,
कृष्णचंद्र की वाइफ बनकर आई सीता...

अज्ञानी निकले निरे, पंडित ज्ञानीराम,
कौशल्या के पुत्र का रक्खा दशरथ नाम,
रक्खा दशरथ नाम, मेल क्या खूब मिलाया,
दूल्हा संतराम को आई दुल्हन माया,
'काका' कोई-कोई रिश्ता बड़ा निकम्मा,
पार्वती देवी हैं शिवशंकर की अम्मा...

पूंछ न आधी इंच भी, कहलाते हनुमान,
मिले न अर्जुनलाल के घर में तीर-कमान,
घर में तीर-कमान, बदी करता है नेका,
तीर्थराज ने कभी इलाहाबाद न देखा,
सत्यपाल ‘काका’ की रकम डकार चुके हैं,
विजयसिंह दस बार इलैक्शन हार चुके हैं...

सुखीराम जी अति दुखी, दुखीराम अलमस्त,
हिकमतराय हकीमजी रहें सदा अस्वस्थ,
रहें सदा अस्वस्थ, प्रभू की देखो माया,
प्रेमचंद ने रत्ती-भर भी प्रेम न पाया,
कहं ‘काका’, जब व्रत-उपवासों के दिन आते,
त्यागी साहब, अन्न त्यागकर रिश्वत खाते...

रामराज के घाट पर आता जब भूचाल,
लुढ़क जाएं श्री तख्तमल, बैठें घूरेलाल,
बैठें घूरेलाल, रंग किस्मत दिखलाती,
इतरसिंह के कपड़ों में भी बदबू आती,
कहं ‘काका’ गंभीरसिंह मुंह फाड़ रहे हैं,
महाराज लाला की गद्दी झाड़ रहे हैं...

दूधनाथ जी पी रे सपरेटा की चाय,
गुरु गोपालप्रसाद के घर में मिली न गाय,
घर में मिली न गाय, समझ लो असली कारण,
मक्खन छोड़ डालडा खाते बृजनारायण,
‘काका’, प्यारेलाल सदा गुर्राते देखे,
हरिश्चंद्रजी झूठे केस लड़ाते देखे...

रूपराम के रूप की निंदा करते मित्र,
चकित रह गए देखकर कामराज का चित्र,
कामराज का चित्र, थक गए करके विनती,
यादराम को याद न होती सौ तक गिनती,
कहं ‘काका’ कविराय, बड़े निकले बेदर्दी,
भरतराम ने चरतराम पर नालिश कर दी...

नाम-धाम से काम का, क्या है सामंजस्य,
किसी पार्टी के नहीं झंडाराम सदस्य,
झंडाराम सदस्य, भाग्य की मिटे न रेखा,
स्वर्णसिंह के हाथ कड़ा लोहे का देखा,
कहं ‘काका’, कंठस्थ करो, यह बड़े काम की,
माला पूरी हुई एक सौ आठ नाम की...
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