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Monday, September 24, 2012

When Hanuman submitted a TA bill after the journey to bring Sanjeevani Booti...?



After the Lanka War, Hanuman submitted his TA Bill for his tour to pick up the Sanjevani booti, but the Dealing Assistant in the TA Section raised three objections as under...

a) Hanuman did not take permission of King Bharat for undertaking the tour;
b) Hanuman, being a Group 'D' official, was not entitled to Air Travel; and,
c) Hanuman was asked to carry a plant, but instead carried the whole mountain...

Hence, the claim for excess baggage is not acceptable...

When Hanuman invited Ram's attention to the above, he stated that he could do nothing since the queries raised were as per rules...

However, seeing Hanuman's plight, Lakshman volunteered to speak to the dealing assistant and offered him 10 per cent of the amount claimed in the TA Bill...

After that alluring offer, the dealing assistant wrote on file...

I examined this... Since Bharat was ruling as a representative of Ram and since Hanuman had gone on official work under direct directions of Ram, these directions would not only suffice, but would also constitute permission to utilize non-entitled class of travel...

The excess baggage is justified as Hanuman being a Group 'D' official might not have been able to properly identify the proper plant, and, bringing the wrong plant would have entailed multiple journeys, thereby increasing expenditure from the exchequer...

Accordingly, the claim, as submitted, may be passed..."

Monday, September 26, 2011

इन्सान, भगवान, डॉक्टर, और नाराज़गी...

इन्सान को कभी भी डॉक्टर और भगवान को नाराज़ नहीं करना चाहिए...

क्योंकि अगर भगवान नाराज़ हो गए, तो इन्सान डॉक्टर के पास पहुंच जाता है...

...और अगर डॉक्टर नाराज़ हो गए, तो इन्सान भगवान के पास पहुंच जाता है...

Thursday, August 18, 2011

क्या-क्या बनाया भगवान ने...

अध्यापक ने क्लास में लेक्चर के दौरान कहा, "भगवान ने सबसे पहले धरती बनाई... और उसके बाद कुछ दिन के लिए चैन से सो गया..." 

छात्र ने सवाल किया, "फिर क्या हुआ, सर...?" 

अध्यापक बोले, "फिर उठकर भगवान ने धरती पर पहाड़, नदियां, पेड़-पौधे बनाए, और फिर कुछ दिन के लिए चैन से सो गया..." 

छात्र ने फिर पूछा, "उसके बाद, सर...?" 

अध्यापक ने कहा, "फिर भगवान ने आदमी बनाया, और इस बार भी कुछ दिन के लिए चैन से सो गया..." 

छात्र उत्सुकता से बोला, "फिर, सर...?" 

अध्यापक बोले, "इस बार उठने के बाद भगवान ने औरत को बनाया... और तब से अब तक न भगवान चैन से सो पाया है, न आदमी..."

यह चुटकुला मेरी वेबसाइट http://www.NDTVKhabar.com के फरीदकोट (पंजाब) निवासी पाठक पीताम्बर थाकवानी ने भेजा है, और उनका ईमेल आईडी pitamber.thakwani@gmail.com है...

Tuesday, May 10, 2011

राम-सेतु पर राम-हनुमान के बीच वार्तालाप...

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विशेष नोट : इस पोस्ट के लिए मेरी मौसेरी बहन रचना दिलीप कृष्णन को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिसने यह मेल मुझे अंग्रेज़ी में भेजा था, और मैंने इसका अनुवाद कर दिया...
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भगवान श्रीरामचंद्र ने राम सेतु को निहारा तथा बोले, "हे हनुमान, तुमने और तुम्हारी वानर सेना ने कितनी मेहनत से कई शताब्दियों पहले इस शानदार सेतु का निर्माण किया था... तुम लोगों ने यह सेतु इतना मजबूत बनाया था था कि सदियों-सदियों से यह पर्यावरण की सभी विभीषिकाएं झेलता आ रहा है... यह सेतु तुम लोगों की सचमुच बेहद शानदार उपलब्धि है, विशेष रूप से आजकल की स्थिति में, जब 'गैमन' जैसी बड़ी निर्माण कंपनी का हैदराबाद में बनाया पुल उसके उद्घाटन से भी पहले ढह गया..."

हनुमान शिष्टता के साथ सिर झुकाकर बोले, "जय श्री राम... प्रभु, यह सब आपके वरदहस्त से ही संभव हो सका था... हमने तो सिर्फ पत्थरों पर आपका नाम लिख-लिखकर समुद्र में डाले थे, और वे तैरते गए... हमने तो इस सेतु के लिए न टिस्को से स्टील मंगाया था, न ही अम्बुजा अथवा एसीसी से सीमेंट मांगा... परंतु भगवन, आज आप गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहे हैं...?"

राम ने कहा, "हनुमान, दरअसल धरती पर रहने वाले कुछ लोग हमारे इस सेतु को तोड़कर उसके स्थान पर एक नहर का निर्माण करना चाहते हैं... उस नहर के ठेके में करोड़ों-अरबों रुपया लगने जा रहा है, जिसे 'कमाने' के लिए तैयारियां जारी हैं... वे लोग तुम्हारे इस सेतु को तोड़ने में भी कमाएंगे, और फिर नहर बनवाकर तो उससे भी ज़्यादा कमाने वाले हैं..."

हनुमान ने श्रद्धाभाव से नतमस्तक होकर प्रश्न किया, "भगवन, क्यों न हम लोग पृथ्वी पर जाकर उन लोगों के समक्ष अपना पक्ष रखें...?"

राम ने ठंडी आह भरकर कहा, "जिस समय हम वहां थे, तब से अब तक समय बहुत बदल चुका है, हनुमान... सबसे पहले वे लोग हमसे आयु प्रमाणपत्र देने के लिए कहेंगे, और हम लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट है ही नहीं... हम लोगों के समय में लम्बी-लम्बी यात्राएं भी पैदल या रथों पर की जाती थीं, सो, हम लोगों के पास धरतीवासियों की तरह ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं हैं... जहां तक आवास प्रमाणपत्र का प्रश्न है, मेरा तो जन्मस्थान ही विवादों से घिरा हुआ है... पांच-छह दशक से मेरे जन्मस्थान पर विवाद न्यायालय में लंबित है... कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि मैं पैदा ही नहीं हुआ था... अब ऐसी स्थिति में यदि मैं अपनी परम्परागत वेशभूषा तथा धनुष-बाण लेकर पृथ्वी पर चला गया, तो संभव है, जनसाधारण मुझे पहचान ले, परंतु यदि अर्जुन सिंह मिल गए तो वह मुझे शर्तिया किसी जनजातीय कबीले में छोड़ आएंगे, और ज़्यादा से ज़्यादा मुझे आरक्षित कोटे से किसी आईआईटी में एक सीट दिलवा देंगे... और वैसे यदि मैं आज के मानव की वेशभूषा, अर्थात थ्री-पीस सूट, पहनकर जाऊं, और अपने आगमन की घोषणा करूं तो मेरे श्रद्धालुओं तक के मन में अविश्वास उत्पन्न हो जाएगा... सो, मैं तो जबरदस्त असमंजस में हूं..."

हनुमान ने पहले जैसी ही शिष्टता के साथ सिर झुकाकर कहा, "यदि आप अनुमति दें तो मैं आपकी बात की सत्यता सिद्ध करने के लिए गवाही दूंगा कि यह सेतु मैंने स्वयं बनाया था..."

राम फिर बोले, "प्रिय अंजनिपुत्र, मेरे विचार में इससे भी काम नहीं बनेगा... जब तुम इस सेतु के निर्माण का दावा करोगे, वे तुमसे ले-आउट प्लान, और वित्तीय व्यवस्था सहित प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स तो मांगेंगे ही, यह भी बताने के लिए कहेंगे कि ज़रूरी रकम का प्रबंध कैसे किया गया था... और सबसे बड़ी बात, वे तुमसे संपूर्णता प्रमाणपत्र (कम्प्लीशन सर्टिफिकेट) भी मांगेंगे... अब भारतवर्ष में कागज़ी प्रमाणों के बिना कोई भी सत्य स्वीकार नहीं किया जाता... स्थिति ऐसी हो चुकी है, कि तुम्हें लगातार खांसी होने के बावजूद जब तक डॉक्टर लिखकर न दे, तुम्हें बीमार नहीं माना जाएगा... कोई वृद्ध अपनी पेंशन लेने के लिए भले ही स्वयं अधिकारी के समक्ष जाकर खड़ा हो जाए, लिखित प्रमाणपत्र की अनुपस्थिति में उसे जीनित नहीं माना जाता, और उसे नियमित रूप से जीवित होने का प्रमाणपत्र देना पड़ता है... वत्स, व्यवस्था बहुत उलझ चुकी है अब..."

हनुमान फिर नतमस्तक हुए, और बोले, "प्रभु, आप सही कह रहे हैं, परंतु इन इतिहासकारों को मैं कभी नहीं समझ पाया... बीती सदियों में आप समय-समय पर सूरदास, तुलसीदास, त्यागराज, जयदेव, भद्राचल रामदास, और तुकाराम जैसे संतों को दर्शन देते रहे हैं, परंतु फिर भी यह आपके अस्तित्व को नकार देते हैं, तथा रामायण को काल्पनिक कथा बताते हैं... अब मेरे विचार में हमारे पास एक ही उपाय बचा है, कि हम रामायण को पृथ्वी पर दोबारा घटित करें, ताकि सरकारी दस्तावेज़ों में प्रमाण के रूप में सब कुछ दर्ज हो जाए..."

श्रीरामचंद्र मुस्कुराए, "अब वह भी सरल नहीं रहा, हनुमान... रावण को आशंका है कि करुणानिधि की उपस्थिति में वह कहीं संत न समझ लिया जाए... मैंने उसके मामा मारीच से भी बात की थी, जिसने वनवास के दौरान सीता को सुनहरा मृग बनकर ललचाया था, परंतु वह भी अब डर रहा है, और सलमान खान के रहते पृथ्वी पर अवतरित होने के लिए कतई तैयार नहीं है... शूर्पनखा अब आज की नारी हो गई है, और उन्हीं की तरह ब्यूटी-कॉन्शस हो जाने के कारण नाक कटवाने के लिए तैयार नहीं है... दोनों किष्किन्धा नरेश बालि तथा सुग्रीव अब दरअसल कॉरपोरेट चलाते हैं, सो, मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक रूप से झगड़ा करने के लिए राजी नहीं हैं... और देशभर में जातिवाद की राजनीति इस कदर फैल चुकी है कि यदि मैंने शबरी के हाथ से बेर खा लिए तो मुमकिन है, मायावती इसे उनके वोट बैंक पर डाका समझें और भाई मेरे, मेरी जन्मस्थली उनके राज्य में ही है... मेरे कहने का तात्पर्य यह है, वत्स, फिलहाल भारतवर्ष में समस्याएं ही समस्याएं हैं, सो, हमारे लिए बेहतर यही होगा कि हम अगले युग की प्रतीक्षा करें..."
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विशेष नोट : इस पोस्ट के लिए मेरी मौसेरी बहन रचना दिलीप कृष्णन को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिसने यह मेल मुझे अंग्रेज़ी में भेजा था, और मैंने इसका अनुवाद कर दिया...
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यदि आप यह पोस्ट अंग्रेज़ी में पढ़ना चाहते हैं, तो यहां क्लिक करें...

Friday, March 05, 2010

A bridge too far...

इस विशेष व्यंग्य के साथ ही अपने इस ब्लॉग पर अंग्रेज़ी की रचनाएं भी जोड़ना शुरू कर रहा हूं... आशा है, पसंद आएगी...

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Special Note: Thanks to my cousin Rachna Dilip Krishnan, who forwarded this mail to me...
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The Lord Ram surveyed the Ram Setu and said, "Hanuman, how diligently and strenuously you and your vanara sena had built this bridge several centuries back... It is remarkable that it has withstood the ravages of the climatic and geographical changes over centuries... It is indeed an amazing feat, especially considering the fact that a bridge at Hyderabad built by Gammon using latest technology collapsed the other day even before they could stick the posters on its pillars..."

Hanuman with all humility spoke, "Jai Shri Ram, it is all because of your grace... We just scribbled your name on the bricks and threw them in the sea and they held... No steel from TISCO or cement from Ambuja or ACC was ever used... But Lord, why rake up the old issue now..."

Ram spoke, "Well, Hanuman, some people down there want to demolish the bridge and construct a canal... The contract involves a lot of money and a lot of money will be made... They will make money on demolition and make even more money on construction..."

Hanuman humbly bowed down and said, "Why not we go down and present our case...?"

Ram said, "Times have changed since we were down there... They will ask us to submit age proof and we don't have either a birth certificate or a school leaving certificate... We travelled mainly on foot and some times in bullock carts and so we don't have a driving license either... As far as the address proof is concerned, the fact that I was born at Ayodhya is itself under litigation for over half a century, If I go in a traditional attire with bow and arrow, the ordinary folks may recognise me, but Arjun Singh may take me to be some tribal and, at the most, offer a seat at IIT under the reserved category... Also, a God cannot walk in dressed in a three-piece suit and announce his arrival... It would make even the devotees suspicious... So it is dilemma so to say..."

Hanuman replies, "I can vouch for you by saying that I personally built the bridge..."

Ram then said, "My dear Anjaniputra, it will not work... They will ask you to produce the lay-out plan, the project details, including financial outlay and how the project cost was met and the completion certificate... Nothing is accepted without documentary evidence in India... You may cough but unless a doctor certifies it, you have no cough... A pensioner may present himself personally, but the authorities do not take it as proof... He has to produce a life-certificate to prove that he is alive... It is that complicated..."

Hanuman then said, "Lord, I can't understand these historians... Over the years, you have given darshan once every hundred years to saints like Surdas, Tulsidas, Saint Thyagaraja, Jayadeva, Bhadrachala Ramdas and even Sant Tukaram and still they disbelieve your existence and say Ramayana is a myth... The only option, I see, is to re-enact Ramayana on earth and set the government records straight once for all..."

Lord smiled, "It isn't that easy today... Ravan is apprehensive that he may look like a saint in front of Karunanidhi... I also spoke to his mama Mareecha, who appeared as a golden deer to tempt Sita when I was in the forest and he said that he won't take a chance of stepping on earth as long as Salman Khan is around... Shoorpanakha is impressed with today's women, hence has become beauty-conscious, so, not ready to get her nose slit... The kings of Kishkindha, Bali and Sugreeva are running a corporate nowadays, and are not willing to let their fight come out in public... And India is suffering from the caste-politics so much that if I eat the 'ber' given by Shabri, Mayawati may get pissed, as she may think this as the invasion to her vote-bank, and remember my brother, my birthplace is in her state only... So, what I want to say is, my dear, there are nothing but problems everywhere in India, so, we better wait for the next 'Yug'..."
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Special Note: Thanks to my cousin Rachna Dilip Krishnan, who forwarded this mail to me...
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यदि आप इस पोस्ट का हिन्दी में अनुवाद पढ़ना चाहते हैं, तो यहां क्लिक करें...

Wednesday, December 09, 2009

भगवान से बातचीत...

संता सिंह घनघोर शराबी था, लेकिन भगवान शिव का परम भक्त भी था...

रोज़ शाम को दारू पीकर धुत हो जाने के बाद मोहल्ले के शिव मंदिर में जाकर भगवान की बड़ी-सी मूर्ति से घंटों बतियाता रहता, और देर रात ही घर लौटता...

मंदिर के पुजारी जी को संता की यह हरकत पसंद नहीं थी, लेकिन कई बार टोकने के बावजूद संता के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी...

तब एक दिन दारूबाज संता को चकमा देने के लिए पुजारी जी ने संता के पहुंचने से पहले भगवान शिव की मूर्ति हटाकर उसके स्थान पर भगवान गणेश की मूर्ति रख दी...

रोज़ की तरह संता सिंह पूरी तरह धुत हालत में मंदिर पहुंचा, और वहां भगवान शिव की जगह गणेश की मूर्ति देखकर बहुत हैरान हुआ...

कुछ देर तक इधर-उधर देखने के बाद मूर्ति के नज़दीक जाकर धीरे-से बोला, "ओए पप्पू, तेरे पापा कित्थे हैं...?"

भगवान शिव, पृथ्वी यात्रा, और शराब...

देवी पार्वती मायके गई हुई थीं, और नारद मुनि भगवान शिव को प्रणाम करने कैलाश पर्वत आ पहुंचे...
महादेव के पास ध्यानयोग के पश्चात भी समय ही समय रहता था, सो, नारद जी ने चुटकी ली, "प्रभु, आप 'फोर्स्ड बैचलरहुड' का आनंद ले रहे हैं..."

महादेव ने मुस्कुराते हुए कहा, "आप स्वयं तो इन सब बंधनों से अलग हो विश्वभ्रमण करते रहते हैं, अच्छे-अच्छे दृश्य देखते-देखते, श्रेष्ठतम व्यंजनों का स्वाद लेते-लेते आपका मन न अघाता होगा... हम यहां भांग खाकर सर्दी में गुजारा कर रहे हैं, और आपको ठिठोली सूझ रही है...?"

नारद तो नारद ठहरे, चढ़ा दिया प्रभु को, बोले, "ठीक कहा आपने, महादेव... आपकी ही दुनिया में आपका ही नाम लेकर लोग एक से एक स्वादु पेय बना रहे हैं, और पी रहे हैं... और जब आपको चढ़ाने की बारी आती है, तो भांग और धतूरा चढ़ाकर निपटा देते हैं... आप स्वयं धरती पर जाकर उन पेय पदार्थों का आनंद क्यों नहीं लेते... फुर्सत भी है आजकल..."

महादेव को भी बात जंच गई, बोले, "कह तो आप ठीक ही रहे हैं, नारद जी... वैसे भी देवी पार्वती के बिना यहां कुछ नहीं रखा... चलिए, चले चलते हैं..."

नारद ने तपाक से कहा, "नारायण... नारायण... प्रभु, चलता तो अवश्य, परन्तु भगवान विष्णु को भी प्रणाम करने जाना था, सो, बेहतर हो कि आज आप अकेले ही चले जाएं..."

महादेव ने कहा, "कोई बात नहीं, हम अकेले ही पृथ्वी पर हो आएंगे... आप बस भगवान विष्णु से मेरा भी प्रणाम कह दें..."

नारद कैलाश से प्रस्थान कर गए, तो भगवान शिव भी रूप बदलकर, कोट-पैंट डाटकर धरती को चल दिए...

नीचे पहुंचकर देखा, लोग 'जय शिव शंकर' का नारा लगा-लगाकर ताड़ी, शराब, भांग, गांजा, मारिजुआना, और न जाने क्या-क्या चढ़ाए जा रहे थे...

महादेव ने सोचा, "नारद जी सच ही कहते थे... चलो, आज स्वयं भी इन पेयों का भोग लगाता हूं..."

सो, महादेव जा पहुंचे एक बार में और काउंटर पर खड़े हो, बारटेंडर से वहां रखी एक बोतल की ओर इशारा करते हुए पूछा, "वह क्या है, भाई...?"

बारटेंडर हंसा और पूछा, "पहली बार घर से बाहर निकले हो क्या, भाई... यह बीयर कहलाती है, वैसे भी नए होने के कारण तुम्हारे लिए एकदम ठीक रहेगी..."

महादेव ने तपाक से कहा, "तो इधर लाओ..."

भगवान ऊंची वाली कुर्सी पर बैठे, काउंटर पर कोहनियां टिकाईं, और बीयर की बोतल हाथ में आते ही उसे सीधे हलक में उड़ेल लिया...

बारटेंडर का मुंह खुला रह गया, सोचने लगा, "जो व्यक्ति बीयर का नाम तक नहीं जानता था, वह एक ही बार में पूरी बोतल गटककर भी सीधा कैसे बैठा है... पट्ठे की कैपेसिटी मस्त है..."

तभी महादेव ने उसे फिर पास बुलाया और बोले, "यह क्या पानी पिला रहे हो... कुछ दमदार भी है क्या तुम्हारे पास...?"

बारटेंडर ने झिझकते हुए व्हिस्की की एक बोतल भगवान की ओर बढ़ा दी...

प्रभु ने व्हिस्की की बोतल का भी बीयर वाला ही हश्र किया, और बिल्कुल आराम से बैठे रहे...

अब तो बारटेंडर का चेहरा देखने लायक हो गया...

जब तक वह कुछ सोच-समझ पाता, प्रभु ने हुक्म दिया, "भाई, तुम्हारे पास जो कुछ भी है, सब ले आओ..."

बारटेंडर घबराकर रम, वोदका, जिन, स्कॉच, जो कुछ भी था, सब एक-एक बोतल ले आया...

भगवान ने उसकी ओर मुस्कुराते हुए देखा, और एक-एक कर सभी बोतलें हलक में उड़ेलते गए...

अब तक बार में मौजूद बाकी लोग भी अपना पीना छोड़ महादेव का पीना देखने लगे, और बारटेंडर तो घबराया हुआ तमाशा देख ही रहा था...

जब भगवान ने सब खत्म कर दिया, और उसके बावजूद बिल्कुल सीधे बैठे रहे, तो बारटेंडर ने सोचा, "यदि ऐसा ग्राहक पक्का हो जाए तो वारे-न्यारे हो जाएंगे..."

यही विचार मन में रखकर उसने बहुत ही शिष्टता से भगवान से कहा, "आप जितनी पी चुके हैं, उतने में तो ये सब लोग लुढ़क चुके होते... आप ने सब खत्म कर दिया, फिर भी आराम से बैठे हैं, आपको चढ़ी ही नहीं... जरूर आप कोई बहुत बड़ी हस्ती हैं... प्लीज, मुझे बताइए, आप कौन हैं..."

भगवान ने भी एक पल सोचा, फिर बोले, "हम तुम्हारे व्यवहार से प्रसन्न हैं, सो, बताए देते हैं... हम भगवान शिव हैं..."

बारटेंडर मुस्कुराया, लोगों की तरफ मुड़ा, और बोला, "अब चढ़ी साले को..."

वाहेगुरु और पार्किंग स्पेस...

संता सिंह किसी बेहद ज़रूरी काम से अस्पताल पहुंचा, तो उसे कोई पार्किंग स्पेस खाली न मिला...

घबराहट में उसने भगवान से विनती शुरू की, "हे वाहेगुरु, यदि आप मुझे तुरंत एक पार्किंग स्पेस दिला दें, तो मैं सिगरेट-शराब पीना कतई छोड़ दूंगा और प्रत्येक रविवार को गुरुद्वारे भी जाऊंगा..."

तभी अचानक उसे एक पार्किंग स्पेस मिल गया...

संता ने तुरंत सिर उठाया और कहा, "आप रहने दें, वाहेगुरु, मुझे वैसे ही मिल गया..."

Wednesday, November 25, 2009

खो गए भगवान...

सार्थक और उसकी छोटी बहन निष्ठा की शरारतों से पूरा मोहल्ला परेशान था...

माता-पिता रात-दिन इसी चिन्ता में डूबे रहते कि पता नहीं वे दोनों आज क्या करेंगे...

एक दिन मोहल्ले में एक साधु आया, जिसके बारे में लोगों का कहना था कि बहुत पहुंचे हुए महात्मा हैं, हर परेशानी का हल है उनके पास...

एक पड़ोसन ने सार्थक-निष्ठा की मां को सलाह दी, "तुम अपने बच्चों को साधु महाराज के पास ले जाओ... शायद उनके आशीर्वाद से ही इनकी बुद्धि ठीक हो जाए... और मेरी मानो तो दोनों को एक साथ मत ले जाना, क्या पता, दोनों मिलकर वहीं कुछ शरारत कर दें और साधु महाराज नाराज़ हो जाएं..."

मां को पड़ोसन की बात ठीक लगी...

अगले ही दिन मां सार्थक को लेकर साधु महाराज के पास पहुंची...

साधु महाराज ने सार्थक को सामने बिठाया और मां से बाहर जाकर इंतजार करने के लिए कहा...

अब साधु महाराज ने सार्थक से पूछा, "बेटे, तुम भगवान को जानते हो न... बताओ, वह कहां हैं...?"

सार्थक ने कोई जवाब नहीं दिया, बस, मुंह बाए साधु महाराज की ओर देखता रहा...

साधु महाराज ने अपना प्रश्न दोहराया, लेकिन सार्थक अब भी कुछ नहीं बोला...

इस पर साधु महाराज कुछ चिढ़-से गए...

उन्होंने कुछ नाराज़गी दिखाते हुए कहा, "सुनाई नहीं देता क्या, मैं क्या पूछ रहा हूं... जवाब दो, भगवान कहां हैं...?"

साधु महाराज का गुस्सा सार्थक को महसूस हुआ, तो वह उठा और तेजी से बाहर की ओर भागा...

साधु महाराज आवाज़ देते रह गए, लेकिन सार्थक घर पहुंचकर ही रुका, और अपने कमरे में पलंग के नीचे छिप गया...

निष्ठा ने बड़े भाई को इस तरह छिपते हुए देखा तो पूछा, "क्या हुआ, भैया... छिप क्यों रहे हो...?"

सार्थक ने घबराए हुए स्वर में कहा, "निष्ठा, तू भी जल्दी से कहीं छिप जा..."

इतना सुनते ही निष्ठा ने भी पलंग के नीचे घुसने की कोशिश करते हुए पूछा, "लेकिन हुआ क्या...?"

सार्थक बोला, "निष्ठा, इस बार हम बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं... भगवान कहीं खो गए हैं और लोग समझ रहे हैं कि इसमें हमारा हाथ है..."

Thursday, November 19, 2009

लीला प्रभु की...

वाह प्रभु...

क्या लीला है तेरी...

चूहा बिल्ली से डरता है, बिल्ली कुत्ते से डरती है, कुत्ता आदमी से डरता है, आदमी बीवी से डरता है, बीवी चूहे से डरती है... और फिर, चूहा बिल्ली से डरता है...

इसी की सुन, प्रभु...

पत्नी से झगड़े के दौरान आसमान की ओर सिर उठाकर पति ने कहा - प्रभु, ऐसी जिंदगी से तो मौत भली, तू मुझे उठा ले...

पत्नी भी कहां पीछे रहने वाली थी, तुरंत बोली - भगवान, मैं ज़्यादा दुखी हो गई हूं, इनसे पहले तू मुझे उठा ले...

पति तपाक से बोला - प्रभु, तू इसी की सुन, मैं अपनी अर्जी वापस लेता हूं...

दुनिया और कोट...

ग्राहक (दर्जी से शिकायती लहजे में) : अरे, भगवान ने तीन दिन में दुनिया बना डाली थी और तुम्हें एक कोट बनाने में तीन हफ्ते लग गए...

दर्जी (तपाक से) : इसीलिए तो कह रहा हूं, जल्दी का काम ठीक नहीं होता, दुनिया की हालत तो आप देख ही रहे हैं...
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कौन हूं मैं...

मेरी पहेलियां...

मेरी पसंदीदा कविताएं, भजन और प्रार्थनाएं (कुछ पुरानी यादें)...

मेरे आलेख (मेरी बात तेरी बात)...